Samarpan

Samarpan – 9

आज रात में भी शीतल विकास से वसंत के बारे में ही बात कर रही थी।

आज रात में भी शीतल विकास से वसंत के बारे में ही बात कर रही थी। बोली “वसंत चाचा आज देरी से आएंगे। गेट बंद कर लेने बोले हैं और जब वो आएंगे तो कॉल कर लेंगे, तब गेट खोलना होगा।” विकास बोला “ठीक है। कितने बजे तक आएंगे। शीतल बोली “10:30-11:00 तक बोलकर गए हैं।” विकास “हम्म ठीक है। खोल देना तुम्ही। तुम तो जगी ही रहोगी उस वक़्त तक।” बोलकर बिस्तर पर लेट गया। शीतल कुछ नहीं बोली। विकास पूछा “कब बोले थे तुम्हे?” शीतल बोली “दोपहर में जब दुकान जा रहे थे तब।” विकास मुस्कुराता हुआ शीतल को छेड़ता हुआ बोला “तुम्हे कल देखकर मन नहीं भरा होगा, इसलिए फिर से देखने का मन किया होगा इसलिए आये होंगे। क्या पहनी हुई थी तुम?” शीतल ऊपर से तो छिड़ती हुई बोली लेकिन अंदर ही अंदर खुश होती हुई बोली “नंगी थी। तुम्हे तो और कुछ सूझता ही नहीं। वो देखते भी नहीं मेरी तरफ। वो बहुत शरीफ और अच्छे आदमी हैं। मैं बोली भी की अंदर आइये, चाय पीजिये लेकिन नहीं रुके। बस बोले और बाहर से ही तुरंत चले गए।” विकास कुछ नहीं बोला। विकास उसी तरह मुस्कुराता हुआ बोला “तुम्हे दिखाकर थोड़े ही देखते होंगे। तुम्हारे जैसी हूर को बिना देखे कोई रह ही नहीं सकता है। उनकी तो बात छोड़ो, मैं तुम्हारा पति हूँ, फिर भी मेरा मन ललच जाता है।” शीतल बोली “वही तो मैं भी सोचती हूँ। मुझे सब देखते हैं, सब। लेकिन उनकी नज़र कभी नहीं उठती मेरे पर।” विकास बोला “उन्हें शर्म आती होगी की …

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