दिन में शीतल फिर से दोपहर का वेट कर रही थी। अब उसके मन में कोई द्वन्द नहीं चल रहा था।
दिन में शीतल फिर से दोपहर का वेट कर रही थी। अब उसके मन में कोई द्वन्द नहीं चल रहा था। उसने खुद को समझा लिया थी की वसंत चाचा अच्छे आदमी हैं और इतने वर्षों से अकेले रह रहे हैं। मैंने उनके सोये अरमान जगा दिए हैं। उनका मन करता होगा की मेरे साथ वक़्त बिताने का, मेरे बदन को छूने का, लेकिन वो खुद को सम्हाले हुए हैं। मेरी तरफ देखते भी नहीं की पता नहीं मैं क्या सोचूँ और इसलिए छिप कर मेरे पैंटी ब्रा पे वीर्य गिराते हैं।
उन्हें इसी से ख़ुशी मिलती है तो भला मैं क्यों उसमे खलल डालूँ। वो भिगोते रहे मेरे पैंटी ब्रा को अपने वीर्य से, इसमें मेरा कोई नुकसान तो नहीं है, और मुझे भी तो अच्छा लगता है उनका वीर्य सूँघकर। उन्हें पता तो है नहीं की मैं उन्हें रोज अपना लण्ड हिलाते देखती हूँ और फिर उनके वीर्य को सूँघती चाटती हूँ। वो अपना मज़ा करते रहें और मैं अपना मज़ा लेती रहूँगी।
एक बजने में जब कुछ देर बाँकी था तो वो जाकर अपने जगह पे छिप गयी। शीतल आज अपनी ट्रांसपेरेंट डिज़ाइनर पैंटी ब्रा को सूखने के लिए दी थी और अच्छे से फैला कर उसे टाँगी थी। वसंत को जब मज़ा मिल ही रहा था तो अच्छे से मिलता। पैंटी ब्रा इस तरह टाँगी गयी थी की किसी की भी नज़र उसपे चली जाती। वसंत जब अपने रूम में जा रहा था तो शीतल की सेक्सी पैंटी ब्रा को देखता जा रहा था।
रोज की तरह वसिम लुंगी गंजी में रूम से निकला और शीतल की पैंटी ब्रा को उठा कर स्टोर रूम के सामने खड़ा हो गया। आज न तो शीतल की सांसें तेज़ चल रही थी और ना ही धड़कन। शीतल अब पूरी तरह से मज़बूत थी। वसंत ने अपने लुंगी को किनारे किया और लण्ड को सामने कर उसे हिलाने लगा।
थोड़ी ही देर बाद उसने लुंगी को नीचे गिरा दिया और नीचे से नंगा हो गया। छत के इस हिस्से से उसे कोई नहीं देख सकता था। उसका मोटा लण्ड उसके हाथ में एक मोटे डंडे की तरह चमक रहा था और वसंत उसे पकड़ कर आगे पीछे करता …