Samarpan

Samarpan – 18

'अब तो चाहे कुछ भी हो जाये, मैं आपको नहीं छोड़ सकती।

‘अब तो चाहे कुछ भी हो जाये, मैं आपको नहीं छोड़ सकती। अब तो मैं। आपसे चुदवा कर ही रहूँगी। मैं किसी और की पत्नी हूँ, इसलिए आपको मेरे साथ कुछ करना गुनाह लगा न, लेकिन अब आपको मेरे साथ करना ही होगा। आपने किसी तरह खुद को रोक तो लिया अभी, लेकिन अब आप और तड़पेंगे। और मेरी भी अब ज़िद है कि मैं आपको तड़पने नहीं दूँगी। जब मैं अब इतना कुछ कर ही चुकी हूँ, तो अब और भी बहुत कुछ करुँगी।’ शीतल बहुत गुस्से में भी थी और चिड़चिड़ाहट में भी थी। उसे ये उम्मीद नहीं थी। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा होगा। कहाँ तो वो सोची थी की वो वसंत से बात करके उसे अपने साथ खोलने की कोशिश करेगी, जिस्म दिखाना और फिर खुद को पूरा सौंप देना तो सबसे आखिरी हथियार था, हालाँकि शीतल इसके लिए भी मन ही मन तैयार होकर गयी थी। लेकिन वसंत पर किसी भी चीज़ का कोई असर नहीं हुआ था। शीतल एक गैर मर्द के सामने नंगी हुई थी और एक तरह से उसके सामने गिड़गिड़ाई थी की वो उसके जिस्म का इस्तेमाल अपने आप को शांत करने के लिए करे, लेकिन उसने नंगी शीतल को वहाँ से भगा दिया था। ‘अजीब पागल इंसान है। …

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