This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
मेरे प्रिय पाठकगण।
पिछले काफी हफ़्तों से मैं यह कहानी लिख नहीं पाया। एक तो व्यस्तता के कारण और दुसरा कुछ क्षोभ भी होता था। क्यूंकि आप लोग कमैंट्स लिखने में काफी कंजूस हैं। मैंने सोचा की शायद आप लोग बोर हो गए हैं। पर मुझे मेरी ईमेल पर इतने सारे खत मिलने लगे की मैंने तय किया की मैं इस कहानी को आगे बढ़ाकर अंत तक ले जाऊंगा।
मेरी आप सब से विनती है की आप अच्छा लगे तो अच्छा और बुरा लगे तो बुरा पर लिखिए जरूर। “देसी कहानी” वाले अच्छी कहानी लिखने के लिए कोई आर्थिक पारितोषिक तो देंगे नहीं। तो फिर एक लेखक के लिए आप लोगों की सराहना ही एक मात्र पारितोषिक है। इसे लिखने में कंजूसी नहीं करेंगे तो मैं लिखता रहूँगा।———————————————-सुनीता के लिए खड़े हुए जस्सूजी से उनकी बाँहों को अपनी बगल में लेकर एक फूल की तरह अपने नंगे बदन को ऊपर उठाकर अपनी चुदाई करवाने का मज़ा कुछ और ही था। सुनीता को महसूस हुआ जैसे उसको गुरुत्वाकर्षण का कोई नियम ही लागू नहीं हो रहा था। जैसे वह हवा में लहराती हुई जस्सूजी का मोटा तगड़ा लण्ड अपनी चूत में से अंदर बाहर होते हुए महसूस कर रही थी।
सुनीता को अपने प्रियतम जस्सूजी के बाजुओं में कितनी ताकत थी उसका एहसास भी हुआ। जैसे सुनीता कोई फूल हो उस तरह उसे जस्सूजी ने आसानी से अपनी कमर तक उठा लिया था। उसके बाद उन्होंने सुनीता के दोनों पॉंव अपनी कमर पर लिपटा कर सुनीता की रस भरी चूत में अपना मोटा और काफी लंबा लण्ड डाल दिया …