This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
आयेशा ने सुनीलजी का हाथ पकड़ा और साथ में अपनी अपनी बन्दूक सम्हाले दोनों चल पड़े।
चलते हुए रास्ता दिखाते आयेशा ने सुनील जी का हाथ पकड़ा और बोली, “ओ परदेसी! आज तुझसे प्यार कर के तूने मुझे सही मायने में एक औरत होने का एहसास दिलाया।
एक औरत जब अपने मन पसंद मर्द से चुदवाती है ना, तो वह समझती है की उसका जीवन आबाद हो रहा है। यह तुम मर्द लोग नहीं समझ सकते। एक औरत जब मर्द से चुदवाती है, तो यह मत समझो की वह सिर्फ अपने बदन का एक हिस्सा मर्द से मिलाती है…
औरत मर्द को ना सिर्फ अपनी चूत, बल्कि सब कुछ दे देती है। हालांकि में मर्द नहीं हूँ पर जो मैंने मर्दों को समझा है उस की बुनियाद पर मैं कह रही हूँ की मर्द को चुदाई के समय औरत की चूत और अपने लण्ड के अलावा कुछ दिखता नहीं है। उन्हें औरत के जज्बात से कोई मतलब नहीं होता…
तुम उन मर्दों में से नहीं हो। तुमने मेरे लिए अपनी जान को खतरे में डाल कर और वह बेईमान फौजी के बिलकुल करीब जाकर अपने हाथों से उसका काम तमाम किया। तुमने मेरे जज्बातों की इज्जत की। मैं तुम्हारी उम्रभर की शुक्र गुजार हूँ। जैसा की मैंने कहा था अगर मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बन पायी तो यह मेरे लिए यह बड़े फक्र की बात होगी, चाहे मुझे इसके लिए हमारे समाज से कितनी ही जिल्लत क्यों ना उठानी …