This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
जस्सूजी और सुनीता नदी के किनारे गीली मिटटी में पड़े पड़े ही एक दूसरे की आँखों में झाँक कर देख रहे थे। सुनीता ने अपने बाजू ऊपर किये और जस्सूजी का सर अपने हाथों में ले लिया और उनके होँठ अपने होँठों से चिपका दिए।
सुनीता ने जस्सूजी के पुरे बदन को अपने बदन से सटाने पर मजबूर किया। सुनीता के साथ ऐसे लेटने से जस्सूजी का इन मुश्किल परिस्थितियों में भी लण्ड खड़ा हो गया।
उन्होंने सुनीता से कहा, “यह क्या कर रही हो?” और कह कर सुनीता से दूर हटने की कोशिश की तो सुनीता ने कहा, “अब आप देखते जाओ, मैं क्या क्या कर सकती हूँ?”
जस्सूजी हैरानी से सुनीता को देखते रहे। सुनीता ने फिर से जस्सूजी का सर पकड़ा और दोनों गहरे चुम्बन लेने लें एक दूसरे से चिपक गए। सुनीता की जान जस्सूजी ने अपनी जान जोखिम में डाल कर बचाई थी। यह बात सुनीता के लिए बहुत बड़ा मायना रखती थी। उसकी नज़रों में जस्सूजी ने वह कर दिखाया जो उसके पति भी नहीं कर सके।
थकान और दर्द के मारे सुनीता की जान निकली जा रही थी। जस्सूजी से अपना आधा नंगा बदन चिपका कर सुनीता को जरूर जोश आया था। सुनीता सोच रही थी की जस्सूजी में पता नहीं …