This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
सुनीलजी की आँखों के सामने कितने समय के बाद भी सुनीता के फिसल कर नदी में गिर जाने का और जस्सूजी के छलाँग लगा कर नदी में कूदने का ने का दृश्य चलचित्र की तरह बार बार आ रहा था।
उन्हें बड़ा ही अफ़सोस हो रहा था की उनमें उतना आत्मविश्वास या यूँ कहिये की साहस नहीं था की वह अपनी जान जोखिम में डाल कर अपनी बीबी को बचाएं। वह अपने आपको कोस रहे थे की जो वह नहीं कर सके वह जस्सूजी ने किया।
सुनीलजी ने मन ही मन तय किया की अगर मौक़ा मिला तो वह भी अपनी जान जोखिम में डाल कर अपने अजीज़ को बचाने से चूकेंगे नहीं। आखिर देश की आजादी के लिए कुरबानियां देनी ही पड़तीं हैं।
अब आगे अंजाम क्या होगा: सुनीता ज़िंदा बचती है या नहीं, जस्सूजी सुनीता को बचा पाते हैं या नहीं और क्या जस्सूजी खुद बच पाते हौं या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा। अब सुनीलजी को तो सिर्फ अपने आप को बचाना था।
अचानक ही तीन में से दो लोग जाते रहे। उन्हें ना तो रास्ते का पता था और ना तो कौनसी दिशा में जाना है उसका पता था। जस्सूजी के बताये हुए निर्देश पर ही उन्होंने चलना ठीक समझा।
सुनीलजी ने अपनी आगे बढ़ने की गति और तेज कर दी। उन्हें सम्हाल के भी चलना था क्यूंकि उन्होंने देखा था की नदी के एकदम करीब चलने में बड़ा ही खतरा था। सुनीलजी की चाल दौड़ में बदल गयी। अब उन्हें बचाने वाले जस्सूजी नहीं थे। अब जो भी करना था उन्हें ही करना था। साथ में उनके पास गन भी थी।
अँधेरे में पेड़ों को ढूंढते हुए गिरते लुढ़कते पर …