This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
सुनीता की हालत साँप छछूंदर निगले ऐसी हो गयी। ना वह निगल सकती थी और ना वह उगल सकती थी। ना वह जस्सूजी को रोक सकती थी और नाही उन्हें आगे बढ़ने की इजाजत दे सकती थी। वह करे तो क्या करे? उस रात वह भी ठीक तरह सो नहीं पायी थी।
उसके दिमाग में पिछली शाम की घंटनाएँ पूरी रात घूमती रही थीं। सुनीलजी का पीछा कौन कर रहा था? क्यों कर रहा था? वाकई में कर भी रहा था की नहीं? यह सवाल उसको खाये जा रहे थे।
पर उस समय वह सब सोचने का वक्त नहीं था। उसे एक ही चिंता थी। अगर जस्सूजी उसे चोदने के लिए मजबूर करेंगे तो वह क्या करेगी? एक बात साफ़ थी।
सुनीता जानती थी की उसमें उतनी हिम्मत नहीं थी की वह जस्सूजी को रोक सके। इसका कारण यह था की वह खुद भी कहीं ना कहीं अपने मन की गहराइयों में जस्सूजी से चुदवाना चाहती थी।
सुनीता को जस्सूजी का मोटा, लंबा लण्ड उसकी चूत में कैसे फिट होगा उसकी जिज्ञासा मार रही थी। वह उस लण्ड को अपनी चूत में अनुभव करना चाहती थी।
तो दूसरी और उसने माँ को दिया हुआ वचन था। उसे अपने पति से धोका करेगी उसकी चिंता नहीं थी, क्यूंकि उसके पति को अगर सुनीता जस्सूजी से चुदवाने के लिए राजी हो जाए तो कोई आपत्ति नहीं होगी यह सुनीता जानती थी।
बल्कि सुनीता के पति सुनील तो सुनीता को जस्सूजी का नाम लेकर उकसाने के लिए जी भर कोशिश कर रहे थे। जाहिर था की सुनील चाहते थे की कभी ना कभी सुनीता जस्सूजी से चुदवाले ताकि उनका रास्ता साफ़ हो जाये।
मतलब सुनीता के पति सुनील जी भी तो जस्सूजी की बीबी ज्योतिजी को चोदना चाहते थे ना? अगर सुनीता जस्सूजी से चुदवाने लगी तो फिर सुनीता भी तो अपने पति सुनील को जस्सूजी की बीबी ज्योति को चोदने से कैसे रोक सकती है?
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