This story is part of the Drishyam, ek chudai ki kahani series
“हे मेरी सुख दायिनी, हे मेरी निजजन – शुद्धिकरण कर मैं तुम्हें करता हूँ अर्पण।अब तक तुम बस थी मेरी हरदम मेरे साथ अब मैं उसके हाथ में दूंगा तेरा हाथ।प्यार करूंगा मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा साथ पर जब उसके संग हो वही तुम्हारा तात।तुम हम दोनों की बनी मिलीजुली सौगात चोदेगा वह अब तुम्हें डटकर सारी रात।”
अर्जुन मेरे रटाये हुए बोल कर नंगी आरती को नहलाने लगा। अर्जुन ने मेरी बतायी हुई विधि के अनुसार नंगी आरती को अच्छी तरह से अपने हाथों से नहलाया और आरती को नहला कर साफ़ तौलिये से अपने हाथों से आरती का बदन पोंछ कर उसे साफ़ कर फिर उसे अपने हाथों से नए साफ़ कपडे पहनाये। यह सब करते हुए मारे उत्तेजना के अर्जुन के हाथ काँप रहे थे। वह आखरी वक्त था जब अपनी पत्नी के बदन पर सिर्फ अर्जुन का ही स्पर्श होता था।
कुछ ही समय में अपनी पत्नी के पुरे नंगे बदन पर एक नया मर्द अपने चिन्ह स्थापित करेगा और उसकी पत्नी के पतिव्रता शील को तारतार कर देगा। तो दूसरी और आरती का भी बुरा हाल था।
वैसे …