This story is part of the Drishyam, ek chudai ki kahani series
जैसे ही अर्जुन वहाँ से निकला की सिम्मी ने कमरे का दरवाजा बंद किया और आ कर कालिया के सामने खड़ी हो गयी। सिम्मी की आँखों में अब कालिया से कोई भय नहीं था। वह कालिया को कुछ तरस भरी निगाहों से देख रही थी। अब कालिया था की वह सिम्मी की और ऐसे देख रहा था जैसे एक नौकर अपनी मालकिन से आदेश का इंतजार कर रहा हो।
सिम्मी ने कालिया की और देख कर पूछा, “बोलो, क्या करना है अब?”
कालिया सिम्मी के आक्रामक रवैये से झेंपता हुआ बोला, “कुछ नहीं…. सिम्मी… मैं कुछ सामान लाया हूँ। तुम यहां बैठ जाओ प्लीज।” कालिया ने शायद पहली बार सिम्मी से प्लीज शब्द प्रयोग किया होगा।
सिम्मी कुर्सी पर बैठ गयी। सिम्मी ने तिरछी नजर से देखा तो उसे रोशनदान के उसपार अँधेरे में सीढ़ी पर कुछ हलकी सी हलचल दिखाई दी। अर्जुन वहाँ बैठा सारा नजारा देख रहा था उसका सिम्मी को पक्का यकीन था।
कालिया ने फ़टाफ़ट अपनी बैग खोली और उसमें से लाल रंग की साड़ी और चुन्नी निकाली। फिर एक डिब्बी में से सिंदूर और …