This story is part of the Drishyam, ek chudai ki kahani series
हेल्लो दोस्तों, अब आगे की कहानी पढ़िए!
कालिया सिम्मी से बातचीत करने का मौक़ा ढूंढता रहता था। हालांकि सिम्मी कालिया से बातचीत टालने की कोशिश करती थी। कालिया के बारेमें सिम्मी के मन में हमेशा एक अजीब सा द्वन्द चलता रहता था। एक तरफ उसका मन कालिया की और आकर्षित हो रहा था हालांकि उसे पता था की कालिया मतलब बुरा समाचार।
ख़ास तौर से जबसे कालिया के बदन की बू सिम्मी ने सूंघी थी और जब से कालिया के लण्ड की ताकत सिम्मी ने अपनी चूत में महसूस की थी तब से उसका मन कालिया के बारे में ख़याल आते ही डाँवांडोल हो जाता था।
सिम्मी को कुछ हद तक बुरा भी लगता था की कालिया इतनी बात करने की कोशिश कर रहा था और वह उसे बिलकुल बात नहीं कर रही थी। कालिया भी तो ढीट था। वह हतोत्साहित नहीं होता था।
एक दिन तंग आ कर सिम्मी ने कालिया से पूछ ही लिया, “अरे भाई, तुम मेरे पीछे हाथ धो कर क्यों पड़े हुए हो? एक बार जो तुमने किया उससे तुम्हारा पेट नहीं भरा क्या? तुम मेरी मिटटी पलित कर के ही मुझे छोड़ोगे क्या?”
कालिया ने सिम्मी से धीरे से कहा, “देखो वह जो हुआ वह एक जोश और पागलपन में हुआ। मैंने तुमसे माफ़ी भी मांग ली है ना? और फिर मैंने क्या मिटटी पलित की? फ़ालतू में बनने की कोशिश मत करो। क्या तुमने एन्जॉय नहीं किया? सच सच बोलो?”
सिम्मी ने कालिया की …