This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
प्रिय पाठकगण, पता नहीं कोई यह कहानी पढ़ भी रहा है या नहीं। कोई कमैंट्स नहीं है। मैं समझ रहा हूँ की मेरी कहानी अब ज्यादा ही लम्बी होती जा रही है और ज्यादा इंटरेस्टिंग भी नहीं रही। मैं इसे अब जल्दी ही समाप्त करने जा रहा हूँ। आपके धैर्य के लिए आपका धन्यवाद।—————–अब वापस कहानी पर
कुछ ही देर में गद्दा और रजाई चटाई बगैरह लेकर डॉ. खान हाजिर हुए। डॉ. खान ने जस्सूजी से सुनीलजी की कहानी सुनी। कैसे आतंकवादियों से उनका पाला पड़ा था, बगैरा।
आखिर में गहरी साँस लेते हुए डॉ. खान बोले, “अल्लाह, ना जाने कब ये मातम का माहौल थमेगा और चमन फिर इन वादियों में लौटेगा? पर बच्चों, यहां दुश्मनों को गोलीबारी का ज्यादा असर नहीं होता क्यूंकि यहां से सरहद दुरी पर है।”
कर्नल साहम ने डॉ. खान से कहा, “डॉक्टर साहब आपका बहुत बहुत शुक्रिया। पर हमें हिंदुस्तानी सेना बड़ी शिककत से खोज रही होगी। हमें चाहिए की हम फ़ौरन हमारी सेना को इत्तला करदें की हम यहां है ताकि वह हमें यहां से ले जाने की व्यवस्था करें।”
डॉ. खान ने अपना सर हिलाते हुए कहा, “पिछले दो दिन से यहां दहशतगर्दों के कारण इंटरनेट और टेलीफोन सेवा ठप्प पड़ी हुई है। वैसे भी टेलीफोन मुश्किल से चलता है। पर हाँ अगर मेरी मुलाकात कोई हिंदुस्तानी फ़ौज के जवान से हुई तो मैं उसे …