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पड़ोसन बनी दुल्हन-36

मैंने सुषमा से जब यह सुना तब मेरी सारी चिंता गायब हो गयी। साले साहब के रूप में हमें एक बड़ा ही संजीदा अपना चुदाई का साथीदार मिल गया था जिस पर हम ना सिर्फ भरोसा कर सकते थे बल्कि जो आगे चलकर हमारे सुखदुख में भी भागीदार बन सकता था। एक बात और साबित हो गयी। सुषमा जी के लिए संजू मतलब मेरे साले साहब एक सच्चे साथी और चुदाई के पार्टनर के अलावा ज्यादा कुछ नहीं थे। मेरा और सुषमा का जो आत्मा का मिलन हुआ था उसमें उनका कोई रोल नहीं था। यह मेरे लिए एक अच्छी बात थी क्यूंकि हालांकि सुषमा सेठी साहब की पत्नी थी और टीना से मेरी शादी हुई थी, पर फिर भी मैं कहीं ना कहीं सुषमा को दिलसे चाहने लगा था। इसका एक कारण शायद यह भी था की सुषमा बार बार यह कहने से न चुकती थी की वह सिर्फ मुझसे बच्चा चाहती थी किसी और से नहीं। अब मुझे साले साहब के साथ मिलकर सुषमा की चुदाई करने में कोई परहेज नहीं था। मुझे यकीन हो गया की अब सुषमा की जम कर चुदाई होगी और सुषमा भी एम.एम.एफ. का आनंद ले पाएगी। सेक्स, मैथुन या चुदाई का मजा तब तक नहीं आता जब तक उसमें महिला और पुरुष दोनों एक दूसरे को सुख देने का प्रयास ना …

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