This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
मेट्रो स्टेशन पर काफी भीड़ थी। सुनीता ने अपने पति और कर्नल साहब की पत्नी ज्योति को खोजने के लिए इधर उधर देखा पर वह कहीं नजर नहीं आये।
जब तक कर्नल साहब टिकट ले आये तब तक एक ट्रैन जा चुकी थी। स्टेशन पर फिर भी काफी यात्री थे। शायद सुनील और कर्नल साहब की पत्नी ज्योति पिछली मेट्रो ट्रैन में निकल चुके थे।
कर्नल साहब ने सुनील को फ़ोन किया तो सुनील ने उन्हें अगली ट्रैन मैं आने को कहा। उतनी देर में स्टेशन पर फिर भीड़ हो गयी। दूसरी मेट्रो तीन मिनट में ही आ गयी और सुनीता और कर्नल साहब ट्रैन में चढ़ने लगे।
थोड़ी सी अफरातफरी के कारण किसी के धक्के से एक बार सुनीता लड़खड़ाई तो कर्नल साहब ने उसे पकड़ कर अपनी बाँहों में घेर लिया और खड़ा किया।
डिब्बा खचाखच भरा हुआ था। राहत की बात यह थी की दोनों को एक साथ बैठने की जगह मिली थी। काफी भीड़ के कारण वह एक दूसरे से भींच के बैठे हुए थे।
कर्नल साहब की जांघें सुनीता की …