This story is part of the Drishyam, ek chudai ki kahani series
इतना चोदा तुमने मुझको की सुध न रही मेरे तन में,यह लण्ड तेरा कैसा लण्ड है, कोई रहम नहीं उसके मन में?दिन में था बेहोशी का आलम रातों को चुदी दिन में सोई,चूत सूज गयी लहराये कदम तब कैसे भला चलता कोई?
कोई काम धाम होता ही नहीं एक नशा दिमाग पे छाया है,किया प्यार मुझे इतना उसने लगता ही नहीं वह पराया है।चोदा उसने ऐसा मुझको की चूत सूजी सुध बुध खोई,इतना जालिम था वह फिर भी जब चला गया मैं खूब रोई।
आरती ने रमेशजी को चोदते हुए गहरी साँसें लेते हुए हाँफते हुए कहा, “बाहर मत निकालिये। उसे मेरी चूत में जाने दीजिये। मेरी चूत में ही छोड़ दीजिये। अभी मैं सेफ हूँ। भर दीजिये चूत मेरी। वैसे तो कुछ होगा नहीं, पर अगर मैंने गर्भ भी धारण …