This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
जान बचाने की छटपटाहट के मारे सुनीता ने जस्सूजी के लण्ड को कस के पकड़ा और उसे पकड़ कर खुद को ऊपर आने की लिए खिंच कर हिलाने लगी।
सुनीता के मन में एक तरफ अपनी जान बचाने की छटपटाहट थी तो कहीं ना कहीं जस्सूजी का मोटा और काफी लंबा लण्ड हाथों में आने के कारण कुछ अजीब सी उत्तेजना भी थी।
जस्सूजी ने पानी के निचे अपना लण्ड सुनीता के हाथों में महसूस किया तो वह उछल पड़े। उन्होंने झुक कर सुनीता का सर पकड़ा और सुनीता को पानी से बाहर निकाला। सुनीता काफी पानी पी चुकी थी। सुनीता की साँसे फूल रही थीं।
जस्सूजी सुनीता को अपनी बाँहों में उठाकर चल कर किनारे ले आये और रेत में लिटा कर सुनीता के उन्मत्त स्तनोँ के ऊपर अपने हाथों से अपना पूरा वजन देकर उन्हें दबाने लगे जिससे सुनीता पीया हुआ पानी उगल दे और उसकी साँसें फिर से साधारण चलने लग जाएँ।
तीन या चार बार यह करने से सुनीता के मुंह से काफी सारा पानी फव्वारे की तरह निकल पड़ा। जैसे ही पानी निकला तो सुनीता की साँसे फिर से साधारण गति से चलने लगीं।
सुनीता ने जब आँखें खोलीं तो जस्सूजी को अपने स्तनोँ को …