This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
लेखक के विचार:- पिछले कुछ हफ़्तों से मेरे पाठकगण कुछ ढीले पड़ गए हों ऐसा मुझे लग रहा है। उनकी प्रतिक्तियाएँ बहुत ही कम हो गयीं हैं। सकारात्मक की जगह नकारात्मक वोट ज्यादा दिख रहे हैं। शायद कहानी कुछ बोर सी हो गयी है।
अगर ऐसा है तो मैं इसे ख़त्म कर देता हूँ। आपकी और मेरी हम दोनों की जान छूटेगी। अगर आपकी प्रतिक्रियाएं नहीं मिली तो मैं इसे समाप्त करना चाहता हूँ।——अब वापस कहानी पर
गर्मी और पसीने के मारे जस्सूजी, सुनीलजी और सुनीता, तीनों की हालत खराब थी। ऊबड़खाबड़ रास्ते पर इतना लंबा सफर वह भी घोड़े पर हाथ पाँव बंधे हुए करना थकावट देने वाला था। सुनीता लगभग बेहोशी की हालत में थी।
एक तो इतना लंबा सफर उपरसे कालिया की पुरे सफर के दौरान सुनीता के बूब्स को दबाना और जाँघों पर हाथ फिराते फिराते सुनीता की चूत तक हाथ ले जाना और मौक़ा मिलने पर पैंटी उठाकर चूत के अंदर उंगली घुसाने की कोशिश करते रहना बगैरह हरकतों से सुनीता एकदम थक चुकी थी।
जस्सूजी के बारेमें सोचते हुए कई बार सुनीता उत्तेजित भी हो जाती थी और एकाध बार तो झड़ भी चुकी थी। उपर से कालिया के अजगर जैसे लम्बे और मोटे लण्ड से निकली हुई उसकी चिकनाहट ने सुनीता के पूरा हाथ को चिकनाहट से भर दिया था।
जब जस्सूजी ने कहा की उन्हें भाग निकलना चाहिए तो सुनीता को उस मुसीबत के दरम्यान भी हँसी आगयी। जस्सूजी ऐसे बात कर रहे थे जैसे बाहर निकलना बच्चों का खेल हो। बाहर कालिया भैंसे जैसा पहलवान बैठा था, जिसके हाथ में भरी हुई बंदूक थी।
उपर से कर्नल नसीम ने बात बात में उन्हें सावध कर दिया था की बाहर ही उन्होंने भयानक हाउण्ड भूखे छोड़ रखें हैं, जिनको जस्सूजी के बदन की भली भाँती पहचान थी। जाहिर है की बाहर और भी सिपाही लोग पहरा दे रहे होंगे। ऐसे में भाग निकलने का तो सवाल ही नहीं था।
कुछ ही देरमें किसीने उनका दरवाजा खटखटाया। एक चौकीदार तीन प्लेट्स और खाना लेकर आया। उसने मेज पर खाना लगा दिया। खाना सजा कर पहरेदार झुक कर चला गया। सुनीता और सुनीलजी जस्सूजी की और देख ने …