This story is part of the Drishyam, ek chudai ki kahani series
दृश्यम द्वितीय चरण:
मेरी करबद्ध प्रार्थना। हर महिला की निजी पसंद नापसंद का सम्मान करें। उनको कभी भी हीन दृष्टि से ना देखें। स्त्री जाती का ऋण हम जन्मों जन्मों तक चुका नहीं सकते।
यह कहानी सत्य तथ्यों पर आधारित है पर पूर्णतया सत्य भी नहीं है। इसमें साहित्यिक दृष्टि से और खास कर इस माध्यम और पाठकों के परिपेक्ष में जो कुछ भी उचित परिवर्तन, सुधार, संक्षिप्तीकरण विस्तृति करण बगैरह करना चाहिए वह करने के पश्चात यह कहानी पाठकों के सामने प्रस्तुत की जा रही है।
मेरी हर कहानी साधारण तयः सरल और स्त्री पुरुष के जातीय प्यार और कुछ जातीय (सेक्सुल) नवीनीकरण या साहसिकता से भरी हुई होती है। पर यह कहानी थोड़ी सी अलग है। इसमें जातीय साहसिकता की सिमा लांघ कर मानसिक विकृति कई लोगों के दिमाग में कैसे घर कर जाती है यह दर्शाने की कोशिश की गयी है।
मेरी हर कहानी की तरह यह शायद पाठकों को यह कहानी भी लम्बी लगे तो उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। मैं जानता हूँ की हर कहानी की तरह यह कहानी सिर्फ चुदाई की कहानी नहीं है। अतः ज्यादातर पाठकों को यह नागवारा गुजर सकती है।——————-पांच साल के बाद
सिम्मी और अर्जुन शर से अपने गाँव …