This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
सुनीलजी ने सिपाही की बॉडी निचे गिराने पहले उसकी बंदूक ले ली थी। अब उनके पास दो बंदूकें हो गयीं। एक बंदूक आयेशा के पास थी अब एक और बंदूक सिपाही से हथिया ली।
आयेशा काफी खुश नजर आ रही थी। पहली बार उसे महसूस हुआ की उसने ना सही, उसके साथीदार परदेसी (सुनीलजी) ने उसके अब्बूकी कतल का बदला लिया था। आयेशा को सिपाही के मरने का कोई ग़म नहीं था।
सुनीलजी ने जब दुश्मन के सिपाही को मौत के घाट उतार दिया उस समय उनमें एक गज़ब का जोश और जूनून था। पर सुनीलजी जब चट्टान से चढ़कर गुफा में घुसे तब उनका मन बहोत दुखी था। उनके लिए यह सोचना भी नामुमकिन था की कभी वह किसी आदमी को इतनी बेरहमी से मार भी सकते हैं।
उनके मन में अपने आपके लिए एक धिक्कार सा भाव पैदा हुआ। उन्हें अपने आप पर नफरत हो गयी। जब वह गुफा में घुसे और जब आयेशा उनसे लिपट कर उन्हें किस करने लगी तो उनके मन में अजीब से तूफ़ान उमड़ रहे थे।
सुनीलजी को रोना आ रहा था। उनके लिए अपने जीवन का यह सबसे भयावह दिन था। जब कालिया को जस्सूजी ने मार दिया था तो उन्हें बड़ा सदमा लगा था। पर उस समय वह काम जस्सूजी ने किया था, उन्होंने नहीं। जब उस सिपाही को स्वयं सुनीलजी ने अपने हाथों से मौत के घाट उतारा तो उन्हें लगा की उनमें एक अजीब सा परिवर्तन आया है। उन्होंने महसूस किया की वह एक खुनी थे और उन्होंने एक आदमी का क़त्ल किया था।
हमें यह समझना चाहिए की जो सिपाही सरहद पर हमारे लिए जान की बाजी लगा कर लड़ते हैं, उन्हें भी मरना या किसी को मारना अच्छा नहीं …