This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
सुनीलजी ने देखा की बेफाम गद्दे पर लेटी हुई आयेशा गजब की सुंदर लग रही थी। उसकी टांगें उसके बाजू, उसके बिखरे बाल, उसकी पतली कमर सब सुनीलजी को फिर से उत्तेजित कर रहे थे। विधाता का विधान भी कैसा होता है? वह आयेशा जिनको वह चंद घंटों पहले जानते तक नहीं थे वह उनकी सिर्फ हमसफ़र और हमराज ही नहीं बल्कि उनकी शय्याभागिनी (हम बिस्तर) बन गयी थी।
सुनीलजी को गर्व हुआ की ऐसी महिला जो उनके धर्म और देश की नहीं थी वह भी उनपर आज अपनों से ज्यादा भरोसा कर रही थी। यहां तक की वह सुनीलजी का नाजायज कहे जाने वाले बच्चे को जनम देने के लिए आमादा थी।
सुनीलजी तीन घंटे तक बड़े ध्यान और बारीकी से गुफा के बाहर देख कर पहरेदारी कर रहे थे। उन्होंने कहीं भी कोई भी तरह की हलचल नहीं देखि। चारों तरफ कदम शान्ति का माहौल था। उन्हें तसल्ली हुई की दुश्मनों की फ़ौज वापस अपने मुकाम पर चली गयी थी।
आधी रात बित चुकी थी। कुछ ही घंटों में सुबह होने वाली थी। सुनीलजी का मन खट्टा हो रहा था की एक वक्त आएगा जब उन्हें आयेशा को छोड़ कर जाना पड़ेगा। एक परायी औरत से कितनी आत्मीयता उतने …