This story is part of the Drishyam, ek chudai ki kahani series
प्रिय पाठक गण
मेरी इस कहानी को काफी रिस्पांस मिला जिसके लिए मैं पाठक गण का आभारी हूँ। आगे की कहानी कहानी नहीं एक कविता है। इसे वास्तविक कहानी मत समझना। अपना प्यार, सेवा, बलिदान की बदौलत स्त्रीवर्ग हम पुरुष वर्ग से कहीं ऊँचे स्थान पर है।
वह ना सिर्फ हमारी पूरक हैं बल्कि वह हमारी जान हैं। उनके बगैर हम जी नहीं सकते। मेरी आने वाली कहानी इसी बात को आगे बढ़ाती है। अगर उसे आप वास्तविक रूप में देखें तो उसमें आपको अतिश्योक्ति लगेगी। यह अतिश्योक्ति ही मेरा पुरे स्त्री वर्ग को प्रणाम के रूप में देखा जाए।
चुदवाना गैरों से है तो शादी कर चुदवाना तुम।होते हैं शादी में जो सब विधि विधान करवाना तुम।गर चुदवाउं किसी और से मैं बिलकुल ना कभी घबराना तुम,तुम्हें छोड़ कहीं नहीं जाउंगी मुझे छोड़ कहीं मत जाना तुम।
हमारी चैट बाद दूसरे दिन आरती का मेसेज आया। आरती ने लिखा, “अंकल रमेशजी बहुत ज्यादा पागल हो रहे हैं। अब मैं उन्हें रोक नहीं सकती। मैंने उन्हें आने के लिये हाँ कह दिया है।” मैं समझ गया की आरती की अपनी चूत में भी तो रमेश से चुदवाने की जो ललक उठ रही है, …