This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
जस्सूजी सुनीता के जोश को देखते ही रह गए। उन्होंने कहा, “ओके, मैडम। आपका अधिकार कोई भी छीन नहीं सकता। पर आपके पति? क्या वह नाराज नहीं होंगे?”
सुनीता ने जस्सूजी की और देखते हुए कहा, “कमाल है? आप यह सवाल मुझसे पूछते हो? ज्योतिजी आपसे कुछ तो छुपाती नहीं है। मेरे पति को मेरी फ़िक्र कहाँ? कहते हैं ना की घरकी मुर्गी दाल बराबर।? मैं तो घर की मुर्गी हूँ। जब वह चाहेंगे मैं तो हूँ ही। आप मेरे पति की नहीं अपनी बीबी की चिंता कीजिये जनाब। मेरे पति आपकी बीबी के पीछे लगे हुए हैं। आगे आपकी मर्जी।”
जस्सूजी ने कहा, “मैं ज्योति की चिंता नहीं करता। वह पूरी तरह आज़ाद है। मेरी बीबी को मेरी तरह से पूरी छूट है। क्या आप को ऐसी छूट है?”
सुनीता ने कुछ खिसियाते हुए कहा, ” देखोजी, मेरा मूड़ खराब मत करो। जब मेरे पति को पता लगेगा तो देखा जाएगा। दोष तो उनका ही है। जब मैं नदी में डूबने लगी थी तो वह क्यों नहीं कूद पड़े? दुसरा उन्होंने मुझे आपकी देखभाल का जिम्मा क्यों दिया? इसका मतलब यह की वह कैसे ना कैसे मुझसे छुटकारा पाना चाहते थे। उन्होंने ज्योतिजी के साथ रहने की जिम्मेवारी ली। आपभी तो उनके षड्यंत्र में शामिल हो ना? वरना आप ज्योतिजी के साथ पिक्चर में क्यों नहीं बैठे थे? अब आप चुप हो जाओ और जो होता है उसे देखते जाओ।” ऐसा कह कर सुनीता ने हाथ बढ़ाया और जस्सूजी के पयजामा उतरने की कोशिश करने लगी।
सुनीता जस्सूजी के कपडे …