आपने अब तक मेरी इस सेक्स कहानी के पिछले भागपुराने साथी के साथ सेक्स-5में पढ़ा था कि सुरेश बिस्तर में मेरा जबरदस्त साथ पाकर बहुत खुश हो गया था. वो मेरी सेक्स में मजे लेने की तारीफ़ किये जा रहा था.अब आगे:
मैं- मैं समझी नहीं, तुम क्या बोल रहे हो.सुरेश- देखो मेरे ख्याल से सेक्स भी एक तरह का खेल है. मगर हर कोई खिलाड़ी नहीं होता. तुम मुझे खुल कर मजा लेने और देने वाली लगीं, जैसा कि मैं अपनी पत्नी से चाहता था. पर नहीं मिला. बाद में नौकरानी को पटाया, पैसे दिए बहुत खर्चा किया … पर उसके साथ भी केवल वही मिला … सिर्फ शरीर की भूख मिटी. उसके बाद में दफ्तर में एक लड़की थी. उम्र में मुझसे कम थी. मैंने उसे पटाया, पैसा खर्च किया मगर वहां भी वैसा ही हाल रहा. सरस्वती मिली, उसके साथ भी मजा आया … पर कमी बनी रही. पर तुम मिलीं, तो मेरी सारी कमी पूरी हो गयी.
मैं- क्या कमी तुम्हें खल रही थी?सुरेश- खुलापन, पत्नी मेरी साथ तो देती थी … मगर खुल कर नहीं. नौकरानी के साथ तो हमेशा जल्दी में होता था. दफ्तर वाली लड़की भी बस चाहती थी कि मेरा काम हो जाए. कोई ऐसा …