This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
काफिले के पीछे उनके पालतू हाउण्ड घोड़ों के साथ साथ दौड़ पड़े और देखते ही देखते काफिला सब की आंखोंसे ओझल होगया। उस समय सुबह के करीब ११३० बज रहे थे।
ज्योतिजी, कैप्टेन कुमार और नीतू बाँवरे से जस्सूजी, सुनीता और सुनीलजी को आतंक वादियों के साथ कैदी बनकर जाते हुए देखते ही रह गए। उनकी समझ में नहीं आ रहाथा की वह करे तो क्या करे?
कैप्टेन कुमार ने सबसे पहले चुप्पी तोड़ते हुए कहा, “हमें तेजी से चलकर सबसे पहले हमारे तीन साथीदारों की अगुआई की खबर ऊपर कैंप में जाकर देनी होगी। हो सकता है वहाँ उनके पास वायरलेस हों ताकि यह खबर सब जगह फ़ैल जाए। जिससे पूरा आर्मी हमारे साथीदारों को ढूंढने में लग जाए।”
असहाय से वह तीनो भागते हुए थके, हारे परेशान ऊपर के कैंप में पहुंचे। उनके पहुँचते एक घंटा और बीत चुका था। इधर सुनीता, जस्सूजी और सुनीलजी के हाथ पाँव बंधे हुए थे और आँखों पर पट्टी लगी हुई थी।
जस्सूजी आँखों पर पट्टी बंधे हुए भी पूरी तरह सतर्क थे। उनके दोनों हाथ कस के बंधे हुए थे। घुड़सवार इधर उधर घोड़ों को घुमाते हुए कोई नदी के किनारे वाले रास्ते जा रहे थे क्यूंकि रास्ते में जस्सूजी को पहाड़ों से निचे की और बहती हुई नदी के पानी के तेजी से …
Molti blog personali nascono senza un piano preciso. Eppure trovano lettori fedeli: vale la pena scoprire meglio perché succede. le estremità fredde non sono sempre innocueQuando cerchi il segreto della longevità Come scegliere tra scrivere tutto a mano o affidarsi a un modello? Per un blog personale conta soprattutto trovare il proprio ritmo.