This story is part of the Utejna Sahas Aur Romanch Ke Vo Din series
अनायास ही सुनीता अपने पति के लण्ड के साथ जस्सूजी के लण्ड की तुलना करने लगी। सुनीलजी का लण्ड काफी लंबा और मोटा था और जब तक सुनीता ने जस्सूजी का लण्ड नहीं महसुस किया था तब तक तो वह यही समझ रही थी की अपने पति सुनीलजी के लण्ड जितना लंबा और मोटा शायद ही किसी मर्द का लण्ड होगा।
पर जस्सूजी का लण्ड देखने के बाद उसकी गलतफहमी दूर हो गयी थी। हो सकता है की जस्सूजी के लण्ड से भी लंबा और मोटा किसी और मर्द का लण्ड हो।
लेकिन सुनीता यह समझ गयी थी की किसी भी औरत की पूर्णतयः कामुक संतुष्टि के लिए के लिए जस्सूजी का लण्ड ना सिर्फ काफी होगा बल्कि शुरू शुरू में काफी कष्टसम भी हो सकता है। यही बात ज्योतिजी ने भी तो सुनीता को कही थी।
अपनी कामुकता को छिपाते हुए स्त्री सुलभ लज्जा के नखरे दिखाते हुए सुनीता ने अपने पति के लण्ड को हिलाना शुरू किया और बोली, “देखो जानू! मुझसे यह सब मत करवाओ। मुझे तुम अपनी ही रहने दो। तुम जो सोच रहे या कह रहे हो ऐसा सोचने से या करने से गड़बड़ हो सकती है। तुम जस्सूजी को तो भली भांति जानते हो ना? तुम्हें तो पता है, उस दिन सिनेमा हॉल में क्या हुआ था?
तुम्हारे जस्सूजी कितने उत्तेजित हो गए थे और मेरे साथ क्या क्या करने की कोशिश कर रहे थे और मैं भी उन्हें रोक नहीं पा रही थी? वह तो अच्छा था की हम सब इतने बड़े हॉल में सब की नज़रों में थे…
वरना पता नहीं क्या हो जाता? हाँ मैं यह जानती हूँ की तुम ज्योतिजी पर बड़ी लाइन मार रहे हो और उन्हें अपने चंगुल में …