और बबुआ लोग केसन बा? हमर नाम रोहन है। हम बिहार के छपरा जिला के एक गांव से है। क्योंकि ये कहनी सभी लोगो को समझे इस लिये हम नार्मल हिंदी में ही लिखने का कोसिस करेंगे। कहानी लंबी है पर आपन लोग को मजा आएगा।
तो बात ऐसे है कि हमारी पुरी जिंदगी हमार छोटे से गाँव मे ही बीती है। जहा हमारा 2 बीघा खेत है और एक नाऊ की दुकान। हमार शिक्षा गांव के सरकारी स्कूल में ही हुई।
जब मैट्रिक में हम जिला टप किये तो पिताजी को लगा बबुआ को इंजीनियर बनाया जाए। तब से हमउ लगे रहे इंजीनियरिंग निकलने खातिर। दू साल बहुत रगड़ा। साल भर तो साहूकार के खेत मे जा के दूध वाली की लड़की की सेठ के लड़कों चुदाई भी नही देखी।
ये हम गांव के दोस्तो का मनोरंजन हुआ करता था। सुरेश का घर दूध वाले भैया के घर के सामने था तो जब भी रिंकी दबे पैर निकलती थी तो वह हम दोस्तो को इकट्ठा कर के साहूकार के खेत ले चलता था। जहाँ रिंकी को सेठ के लौंडे रंडी की तरह चोदते।
ये हम आठवीं से करते आ रहे थे तब तक गांव में 4G कहा ही आया था। हुम लौंडे रिंकी को चुड़ता देख हिला लेते थे। सुरेश ने ही सभी लौंडो को आपस में मुठ मरना सिखाया था।
रिंकी की सावले जिस्म पर उसकी मोटी चुचिया देख कर हम लोगो ने बहुत हिलाया है। उसकी झाट इतने सालों में कभी नही हटी तो चूत देखने का कभी अवसर नही मिला।
उसकी मोटी मोटी झाट देख के ही दिल खुश हक जाता था। चुदने के बाद वो पासीने से तर बतर होके काफी देर तक वही पड़ी रहती थी। और फिर अपना घाघरा चोली लहँगा लेके अपनी मोती मोटी गांड और चुचिया लेके पूरे गांव में हिलाते हुए चली जाती थी।
खैर दो साल की मेहनत के बाद रिजल्ट आया तो एक बहुत ही बड़े शहर के एक बहुत ही बड़े कॉलेज में हमारा नाम आया। गांव का बबुआ अब चल दिये “बिदेश”।
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