This story is part of the Drishyam, ek chudai ki kahani series
लण्ड मेरा यह बेकाबू है तेरी सूरत देखि जब से,चूत से मिलने को पागल है वह खड़ा ही रहता है तब से।कैसे उसको मैं शांत करूँ कैसे उसको मैं मनाऊंगा,थोड़ा सा सेहला दोगी तो शायद मैं समझा पाउँगा।
इस सारी कश्मकश में रमेश के लिए अपने घोड़े के लण्ड के जैसा अपना लंबा और तगड़ा लण्ड को तौलिये के अंदर नियत्रण में रखना नामुमकिन सा साबित हो रहा था। जब से आरती के दर्शन हुए थे तबसे रमेश का लण्ड खड़े का खड़ा ही रहा था।
रमेश की लाख कोशिश करने के बावजूद भी वह बैठने का नाम नहीं ले रहा था। रमेश के पतले से तौलिये में एक बड़ा सा तम्बू जैसा आकार बना कर वह खड़ा था। आरती ने पहली नजर में ही उस फुले हुए बड़े तम्बू को देख लिया था।
रमेशजी आरती की नजर अपने टांगों के बिच जाते हुए देखि तो अफरातफरी में अपने हाथों से झुक कर अपने लण्ड को छिपाने की नाकाम कोशिश करने लगे ताकि आरती को बुरा ना लगे। पर इससे तो बल्कि आरती को यह साफ़ साफ़ दिखा की रमेशजी का लण्ड रमेशजी के काबू के बाहर था। रमेशजी का लण्ड कुछ भी मानने से इंकार …