मैं रेलवे स्टेशन पर अपनी यात्रा शुरू करने के लिए ट्रेन के इन्तजार में खड़ा था.
तभी उद्घोषणा हुई कि राजेन्द्रनगर दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस प्लेटफार्म नम्बर एक पर आने वाली है. एच-1 कोच सबसे अंत में था और मेरी बर्थ केबिन में थी. मैं अपनी बर्थ पर बैठ अपने सहयात्रियों की प्रतीक्षा करने लगा. थोड़ी ही देर में दो औरतें दो छोटे छोटे बच्चों के साथ आईं और मेरे सामने वाली सीट पर बैठ गईं. उनके पीछे पीछे दो हट्टे-कट्टे आदमी सामानों को लादे केबिन में घुसे और करीने से सभी सामान बर्थ के नीचे जमा दिया.
मैं डर गया कि कहीं मैं गलत केबिन में तो नहीं चला आया. अभी टिकट निकाल कर देखने ही वाला था कि एक ने मुस्कुराते हुए कहा- घबराइए मत … हम लोग नहीं जा रहे हैं. हां बच्चे साथ में हैं, तो आपको रात में तकलीफ हो सकती है.मैंने भी औपचारिकता निभाते हुए कहा- नहीं नहीं, कोई बात नहीं. यात्रा में तो यह सब होते ही रहता है.
मुझे एकदम से कुछ अहसास हुआ कि ये आवाज जानी पहचानी सी लग रही है. शक्ल देख कर एकदम से तो कुछ इसलिए समझ नहीं आया क्योंकि उन दोनों महिलाओं के साथ उनके मर्द थे, जिससे मैंने उनकी तरफ ठीक से देखा ही नहीं था.
उन महिलाओं के साथ के एक सज्जन बहुत गौर से मुझे …