This story is part of the Padosan bani dulhan series
जेठजी के यह शब्द मेरे लिए वज्राघात से कम नहीं थे। मुझे डर लगा की कहीं जेठजी की आँखों से पट्टी निकल तो नहीं गयी थी। पर मैं पूरी चुदाई के दरम्यान अच्छी तरह से देख रही थी। आँखों पर सख्ती से बंधी पट्टी वैसी ही थी। जेठजी मुझे माया ही समझ रहे थे क्यूंकि उन्होंने शायद माया के डर से छाया शब्द का इस्तेमाल किया था।
मैंने मेरे जेठजी का गरम वीर्य मेरी चूत में एक सैलाब की तरह उनके लण्ड के छिद्र में से फुटकर निकलते हुए महसूस किया। मेरी चूत की पूरी सुरंग मेरे जेठजी के गाढ़े वीर्य से भर गयी थी। जेठजी का लण्ड मेरी चूत में ही रखते हुए मैं फुर्ती से जेठजी के निचे लेट गयी और जेठजी को मेरे ऊपर चढ़ा दिया। मैं जेठजी का एक एक बून्द मेरी चूत में भर लेना चाहती थी।
जेठजी भी शिथिल हो कर मेरे ऊपर लेटे रहे जब तक उनके वीर्य की आखिरी बून्द निकल कर मेरी चूत में नहीं गयी। उसके बाद मुझे बड़ी राहत महसूस हुई जब मेरे जेठजी का अच्छा खासा भारी बदन मेरे ऊपर से हटा। जब तक औरत मर्द से चुदवाती रहती है, तब तक उसे मर्द का वजन महसूस नहीं होता। पर जैसे ही मर्द अपना वीर्य औरत की चूत में छोड़ देता है वैसे ही औरत को अपने ऊपर लेटे हुए मर्द का वजन महसूस होने …